कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से अब यह साफ हो चला है कि वहां बीजेपी सरकार बनाएगी. बीजेपी के लिए कर्नाटक 22वां राज्य होगा जहां उसकी सरकार बनेगी. कांग्रेस की सरकार अब सिर्फ पंजाब में है
नई दिल्ली: कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से अब यह साफ हो चला है कि वहां बीजेपी सरकार बनाएगी. बीजेपी के लिए कर्नाटक 22वां राज्य होगा जहां उसकी सरकार बनेगी. कांग्रेस की सरकार अब सिर्फ पंजाब में है यानि वह सिर्फ एक राज्य में मौजूद है. कांग्रेस शासित प्रदेश में बीजेपी का जीतना बड़ी फतह के रूप में देखा रजा रहा है. एग्जिट पोल में भी उसके जीतने की संभावना जताई गई थी. इस चुनाव को कांग्रेस क्यों नहीं जीत पाई, पेश है उसके प्रमुख कारण :
- सत्ता विरोधी लहर : कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार थी. विधानसभा चुनाव 2018 के नतीजों के शुरुआती रुझानों से यही लगता है कि यहां सत्ता विरोधी लहर से भाजपा को फायदा मिला. इसी कारण बीते साल बीजेपी ने यूपी और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत दर्ज की थी. त्रिपुरा, नगालैंड, मणिपुर और मेघालय में भी सत्ता विरोधी लहर ने फतह दिलाई. अगर बीजेपी यहां जीतती है तो यह 21वां राज्या होगा जहां उसकी सरकार बनेगी. उसकी पहले से ही 20 राज्यों में चाहे गठबंधन या बहुमत के रूप में सरकार है. हालांकि सत्ता विरोधी लहर के कारण ही उसे पंजाब से बाहर होना पड़ा था. वहां कांग्रेस जीती थी.
- 2013 के चुनाव से अलग रणनीति : बीजेपी ने इस बार कर्नाटक में 2013 के विधानसभा चुनाव से अलग रणनीति अपनाई. वह एकदम अलग पार्टी के रूप में सामने नजर आई. जितनी भी रैलियां या रोड शो हुए उसमें बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर जमकर प्रहार किया. उसके नेता काफी आक्रामक थे. 2013 में खनन माफिया रेड्डी बंधुओं से रिश्ते सामने आने पर बीजेपी को मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा से इस्तीफा लेना पड़ा था. इससे बीजेपी तीन भागों में बंट गई थी. एक धड़ा पार्टी के साथ था, दूसरा येदियुरप्पा के साथ और तीसरा आदिवासी नेता बी श्रीरामुलु के साथ चला गया था. इस कारण कांग्रेस उस साल चुनाव आसानी से जीत गई थी. लेकिन बाद के वर्षों में बीजेपी ने इस स्थिति में सुधार किया और इस चुनाव में एक पार्टी के रूप में उभरी. उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और मददगार साबित हुआ.
- धनबल : बीजेपी 20 राज्यों में सरकार में है. यह भी संभावना है कि 2019 के आम चुनाव में भी भाजपा को फतह मिले. इससे कारोबारी जगत के लिए बीजेपी कांग्रेस की तुलना में ज्यादा आकर्षक लग रही है. इस कारण पार्टी को डोनेशन भी काफी मिल रहा है. कांग्रेस की सरकार सिर्फ पंजाब में है. इसलिए कारोबारी जगत कांग्रेस में कम रुचि ले रहा है.
- स्वयंसेवकों की फौज : भाजपा के पास अनपेड वालंटियर (स्वयंसेवियों) की फौज है जबकि कांग्रेस की इस मामले में प्रतिद्वंद्वि दल से कोई तुलना नहीं है. उसके पास सिर्फ आइडियोलॉजी (विचारधारा) है. उसे चुनाव में एजेंटों की मदद लेनी पड़ती है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि धन और स्वयंसेवी अकेले चुनाव नहीं जीता सकते हैं. लेकिन अगर ये दोनों साथ आ जाएं और सत्ता विरोधी लहर हो तो यह चुनाव जीतने का मुख्य कारण बन सकते हैं.
- राज्य का पिछड़ना : मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कार्यकाल में कर्नाटक की तरक्की रुक सी गई थी. उनका शासन भले ही प्रभावकारी रहा हो लेकिन उनके कार्यकाल में राज्य का जीडीपी कुछ खास नहीं बढ़ा. सिद्धारमैया ने चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के दांव लगाए. जिन राज्यों में बीजेपी ने हितकारी योजनाओं के बूते चुनाव जीता उन्हें सिद्धारमैया ने अपने यहां लागू किया. मसलन एक रुपए किलो में चावल, आंशिक कर्ज माफी और कैंटीन में सिर्फ 5 रुपए में भोजन उपलब्ध कराना. लिंगायत समुदाय के वोट कांग्रेस के पक्ष में लाने के लिए उन्हें अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने की सिफारिश की. लेकिन ऐसा कम ही देखने को मिला है कि सत्ता विरोधी लहर के आगे हितकारी योजनाएं या जातिगत समीकरण कभी ठहर पाए हैं.
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